ओड़िशा बाक्साइट

ओड़िशा में बाक्साइट खनन के लिए परियोजना

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जयराम रमेश को ओड़िशा खनन निगम द्वारा बाक्साइट खनन के लिए परियोजना के संबंध में बड़ी संख्या में प्रतिवेदन मिले हैं । आज यहां जारी एक बयान में उन्होंने कहा कि परियोजनाओं को स्वीकतिअस्वीकृति के लिए मंत्रालय में अध्ययन किया जा रहा है ताकि कोई अस्पष्टता न रहे और परियोजना के सूत्रधार सैध्दांतिक सहमति का दुरूपयोग न कर पाएं ।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जयराम रमेश ने कहा है कि ओड़िशा खनन निगम निजी कंपनी वेदांत के जरिए राज्य के कलाहांडि तथा रायगड़ा जिलों में खनन परियोजना हेतु 660.749 हेक्टेयर वन्य भूमि चाहता है जिसमें करीब 353.14 हेक्टेयर भूमि नियमगिरि संरक्षित वन की है । आदिवासियों की जीविका तथा अन्य मुद्दों को लेकर परियोजना पर सवाल खड़े हुए हैं ।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जयराम रमेश जी ने बताया कि मंत्रालय को 26 फरवरी 2005 को परियोजना आवेदन मिला था । मंत्रालय ने वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत 11 दिसम्बर, 2008 को इसे सैध्दांतिक मंजूरी दे दी । हालांकि सैध्दांतिक मंजूरी को अंतिम मंजूरी में बदलने के लिए उसमें सन्निहित शर्तों को पूरा किया जाना जरूरी है ।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जयराम रमेश ने बताया कि कई प्रतिवेदन आने के बाद मंत्रालय ने 6 अगस्त, 2009 को भुवनेश्वर के क्षेत्रीय वन मुख्य संरक्षक को इन शिकायतों की जांच का आदेश दिया कि केन्द्र सरकार की अंतिम मंजूरी के बगैर परियोजना गतिविधियां शुरू कर दी गयीं जो वन संरक्षण अधिनियम , 1980 का उल्लंघन है । 16 अगस्त 2009 को सौंपी गई परियोजना स्थल जांच रिपोर्ट में पाया गया कि निर्माण कार्य गैर वन राजस्व भूमि पर शुरू किया गया है ।

हालांकि तकनीकी दृष्टि से यह कानून का उल्लंघन नहीं है लेकिन यह मंत्रालय द्वारा जारी इन दिशा निर्देशों का उल्लंघन है कि जब परियोजना में वन एवं गैर-वन दोनों तरह की जमीनें शामिल हो तब, वन भूमि गतिविधियों के लिए स्वीकृति मिले बगैर गैर वन भूमि पर भी निर्माण शुरू नहीं होना चाहिए । इस संबंध में 25 नवम्बर 2009 को ओड़िशा सरकार को चिट्ठी भेजकर पूछा गया कि इस दिशानिर्देश के उल्लंघन की अनुमति कैसे दी गयी ।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जयराम रमेश ने बताया कि दरअसल मंत्रालय ने 3 अगस्त, 2009 को राज्यों को बाध्यकारी निर्देश भेजा था कि अनुसूचित जनजाति एवं अन्य वन निवास (अधिकारों की पहचान) अधिनियम 2006 में उल्लिखित प्रक्रिया का पूरी तरह संतोषजनक रूप से पालन करने के बाद ही वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वनभूमि को अन्य कार्यों के लिए देने पर विचार किया जाएगा ।

मंत्रालय ने सैध्दांतिक मंजूरी को अंतिम मंजूरी में बदलने पर विचार करने के लिए ओड़िशा सरकार को 3 नवम्बर 2009 को चिटठी भेजकर उक्त दिशानिर्देश के अनुपालन संबंधी साक्ष्य पेश करने को कहा हे । मंत्रालय को राज्य सरकार के जवाब का इंतजार है । इसी बीच वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अंतर्गत दी गयी सैध्दांतिक मंजूरी में उल्लेखित शर्तों के उल्लंघन के संबंध में एक अन्य स्थल से संबंधित ताजे आरोपों की जांच के लिए अगले सप्ताह जांच दल भेजी जा रही है ।

केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि मंत्रालय की नयी नीति में सैध्दांतिक मंजूरी की अवधारणा खत्म कर दी गई है । अब परियोजनाओं की स्वीकृति एवं अस्वीकृति के लिए मंत्रालय में अध्ययन किया जा रहा है ताकि अस्पष्टता दूर हो और परियोजना के सूत्रधार सैध्दांतिक सहमति का दुरूपयोग न करे ।


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